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आजादी के मतवाले शहीद भगत सिंह की जयंती आज, कृतज्ञ राष्ट्र कर रहा है उन्हें याद

आजादी के मतवाले शहीद भगत सिंह की जयंती आज, कृतज्ञ राष्ट्र कर रहा है उन्हें याद


पूरा देश आज क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह की जयंती मना रहा है। देश में क्रांति लाने के मजबूत इरादों से अंग्रेजों के शासन को झकझोर कर रख देने वाले क्रांतिकारी नौजवान को आज एक कृतज्ञ राष्ट्र याद कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत कई अन्य बड़े राजनेताओं, राजनीतिक दलों और मशहूर हस्तियों ने भगत सिंह को उनकी जयंती पर याद किया और अपनी श्रद्धांजलि दी है। 

भगत सिंह का सफर
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था। यह स्थान पर पाकिस्तान का हिस्सा है। हर भारतीय की तरह भगत सिंह का परिवार भी आजादी का पैरोकार था। उनके चाचा अजीत सिंह और श्वान सिंह भी आजादी के मतवाले थे और करतार सिंह सराभा के नेतृत्व में गदर पाटी के सदस्य थे।

अपने घर में क्रांतिकारियों की मौजूदगी से भगत सिंह पर गहरा प्रभाव पड़ा। इन दोनों का असर था कि वे बचपन से ही अंग्रेजों से घृणा करने लगे। 14 वर्ष की उम्र में भगत सिंह ने सरकारी स्कूलों की पुस्तकें और कपड़े जला दिए। जिसके बाद भगत सिंह के पोस्टर गांवों में छपने लगे। 

13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह पर अमिट छाप छोड़ा। भगत सिंह ने लाहौर के नेशनल कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी और 1920 में महात्मा गांधी के अहिंसा आंदोलन में शामिल हो गए। इस आंदोलन में गांधी जी विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर रहे थे। 

भगत सिंह महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे अहिंसा आंदोलन और भारतीय नेशनल कॉन्फ्रेंस के सदस्य थे। लेकिन जब 1921 में हुए चौरा-चौरा हत्याकांड के बाद गांधीजी ने हिंसा में शामिल सत्याग्रहियों का साथ नहीं दिया। इस घटना के बाद भगत सिंह का गांधी जी से मतभेद हो गया। इसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में बने गदर दल में शामिल हो गए। 9 अगस्त, 1925 को सरकारी खजाने को लूटने की घटना में भी उन्होंने अपनी भूमिका निभाई थी। यह घटना इतिहास में काकोरी कांड नाम से मशहू है। इसमें उनके साथ रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद जैसे कई क्रांतिकारी शामिल थे। 

भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज अधिकाकी जेपी सांडर्स की हत्या कर दी थी। इस हत्या को अंजाम देने में चंद्रशेखर आजाद ने उनकी पूरी मदद की। 

अंग्रेजों की सरकार को 'नींद से जगाने के लिए' उन्होंने 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली के सभागार में बम और पर्चे फेंके थे। इस घटना में भगत सिंह के साथ क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त भी शामिल थे। और यह जगह अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेंट्रल असेंबली का सभागार थी। 

लाहौर षड़यंत्र केस में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की सजा सुनाई गई और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास दिया गया। भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे सुखदेव और राजगुरू के साथ फांसी पर लटका दिया गया। तीनों ने हंसते-हंसते देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। 

लेखक भी थे भगत सिंह 
भगत सिंह सिंह आजादी के मतवाले ही नहीं थे। भगत सिंह एक अच्छे वक्ता, पाठक, लेखक और पत्रकार भी थे। वे हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, उर्दू, बंगला और आयरिश भाषा के बड़े विद्वान थे। उन्होंने 23 वर्ष की उम्र में आयरलैंड, फ्रांस और रूस की क्रांति का के बारे गहरा अध्ययन कर लिया था। भगत सिंह को भारत में समाजवाद का पहला प्रवक्ता माना जाता है। 

भगत सिंह ने लगभग दो वर्ष जेल में बिताया। जेल में रहते हुए भी किताबों के प्रति उनका लगाव बरकरार था। वे जेल में लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार अपने साथियों तक पहुंचाते रहे। उनके लिखे गए लेख और परिवार को लिखे गए पत्र आज भी उनके विचारों का आइना हैं। 

उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखा और संपादन भी किया। उन्होंने 'अकाली' और 'कीर्ति' दो अखबारों का संपादन भी किया। उनकी कृतियों के कई संकलन भी प्रकाशित हुए। उनमें 'एक शहीद की जेल नोटबुक, सरदार भगत सिंह : पत्र और दस्तावेज, भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज प्रमुख हैं। 

प्रधानमंत्री ने नेहरू का नाम नहीं लिया मगर कांग्रेसी परिवार कहा. क्या नेहरू ने शहीद भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त से जेल में मुलाकात की थी. एक तो वैसे ही भारत के कॉलेजों में इतिहास से लेकर तमाम विषयों के कई हज़ार शिक्षक नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि इतिहास को लेकर प्रधानमंत्री के कुछ बयानों की चर्चा की जाए ताकि लोग उनकी बात को ही इतिहास की किताब न समझ बैठे. बहुत से बच्चे उनके फैन हैं. अगर वो इस ग़लत इतिहास को ही सही मान लें तो यह अच्छा नहीं होगा. 'Selected Works Of Nehru Volume 4' पेज 13 पर शीर्षक है भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के भूख हड़ताल.

5 जुलाई 1929 को नेहरू का पत्र लिखा

'मैं कल सेंट्रल जेल गया था। सरदार भगत सिंह, श्री बटुकेश्वर दत्त, श्री जतिन नाथ दास और लाहौर केस के सभी आरोपियों को देखा, जो भूख हड़ताल पर बैठे थे। कई दिनों से उनवर्ती खिलाने का प्रयास हो रहा है। कुछ को इस तरह जबरन खिलाया जा रहा है कि उन्हें चोट पहुँच रही है। जतिन दास की स्थिति काफी नाजुक है। वे काफी कमजोर हो चुके हैं और चलफिर नहीं सकते। बोल नहीं पाते, बस बुदबुदाते हैं। उनमें काफी दर्द है। ऐसा लगता है कि वे इस दर्द से मुक्ति के लिए प्राण त्याग देना चाहते हैं। उनकी स्थिति काफी गंभीर है। मैंने शिव वर्मा, अजय कुमार घोष और एल जयदेव को भी देखा। मेरे लिए असंगत रूप से इन बहादुर नौजवानों को इस स्थिति में देखना बहुत पीड़ादायक था। मुझे उनसे मिलकर ऐसा लगा कि वे उनकी तरह ईमानदारी पर कायम हैं। चाहे जो अंजा हो। बल्कि वे अपने बारे में जरा भी परवाह नहीं करते हैं। सरदार भगत सिंह ने उन्हें वहाँ की स्थिति बताई कि कत्ल के अपराध को छोड़कर सभी राजनीतिक बंदियों से विशिष्ट व्यवहार होना चाह रहे हैं। मुझे पूर्ण आशा है कि उन युवकों का महान आत्मत्यग सफल होगा। '

ये नेहरू ने भगत सिंह के बारे में कहा था. अभ्यूदय पत्रिका जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने ज़ब्त कर ली थी, इसके 8 मई 1931 के अंक में नेहरू का भगत सिंह पर लेख छपा था. शीर्षक था 'त्यागी भगत सिंह'.

'यह क्या बात है कि यह लड़का यकायक इतना प्रसिद्ध हो गया और दूसरों के लिए रहनुमा हो गया. महात्मा गांधी, जो अहिंसा के दूत हैं, आज भगत सिंह के महान त्याग की प्रशंसा करते हैं. वैसे तो पेशावर, शोलापुर, बम्बई और अन्य स्थानों में सैकड़ों आदमियों ने अपनी जान दी है. बात यह है कि भगत सिंह का निस्वार्थ- त्याग और उसकी वीरता बहुत ऊंचे दर्जे की थी. लेकिन इस उत्तेजना और जोश के समय भगत सिंह का सम्मान करते हुए हमें यह न भूलना चाहिए कि हमने अहिंसा के मार्ग से अपने लक्ष्य की प्राप्ति का निश्चय किया है. मैं साफ कहना चाहता हूं कि मुझे ऐसे मार्ग का अवलम्बन किए जाने पर लज्जा नहीं होती है, लेकिन मैं अनुभव करता हूं कि हिंसा मार्ग का अवलम्बन करने से देश का सर्वोत्कृष्ट हित नहीं हो सकता और इससे साम्प्रदायिक होने का भी भय है. हम नहीं कह सकते कि भारत के स्वतंत्र होने के पहले हमें कितने भगत सिंहों का बलिदान करना पड़ेगा. भगत सिंह से हमें यह सबक लेना चाहिए कि हमें देश के लिए बहादुरी से मरना चाहिए.' 

भगत सिंह पर सरदार पटेल के विचार

'युवक भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी से सारा देश विक्षुब्ध हो गया है. मैं इन वीरों की प्रथा का अनुकरण नहीं कर सकता. राजनीतिक हत्या अन्य प्रकार की हत्याओं से कम निंदनीय नहीं है, इसमें मुझे तो कोई संदेह नहीं पर सरदार भगत सिंह और उनके साथियों के देशप्रेम, साहस और आत्मबल का कायल हूं. फांसी की सज़ा रद्द करने के लिए जो प्रार्थना अखिल देश ने की थी, उनकी अवहेलना से वर्तमान शासन की ह्रदयहीनता और विदेशीयता जिस प्रकार प्रकट हुई है, वैसे पहले कभी नहीं हुई थी. पर विक्षोभ के आवेश में हमें कर्तव्य से तनिक भी विचलित न होना चाहिए, इन वीर देश भक्तों की आत्माओं को शांति मिले.'

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